एक अनंत सत्य की तरह



आज भी है नवनिर्मित कुछ नित्य की तरह ,
बस वही सुबह , एक अनंत सत्य की तरह

उकास का कारवां चला रहा है ,
स्वप्न खग के परों को कुतरते हुए

आसमां का रंग स्याह हो गया है ,
भोर ने जकड़ ली है ,बाहें धुंध की

समय की लय अनवरत कर रही है ,
हवा से मिलकर गुबार की साजिश

टूटता जा रहा है यूँ विरल अन्धकार ,
किस्तों में विशाल हिमखंड के जैसे

ब्रह्मांड का प्रकाशपुंज झाँक रहा है ,
किसी पहाड़ के गर्वित अड़े अंस से

सूर्य ही ले रहा है अंगडाई इठलाकर ,
रात के खुमार की कैद से छूटने को

चन्द्र पलायन को है तैयार झोला उठा ,
पूरी हो गयी है आज की चाकरी अब।

पूर्व की ओर कोई हलचल तो हुई है ,
झटक रही है उषा कुछ, अलसाई सी

चौंक कर उठ गए है ओस के मोती ,
समेटते है भयभीत अपना अस्तित्व।

बढता जा रहा है पक्षियों का कलरव ,
निमंत्रण दे रहा है ,जीवन की गति को।

सजीव निर्जीव होकर चले है रोटी ढूँढने ,
कुछ अभी भी पड़े है निर्लज्ज तन कर

आज भी है नवनिर्मित कुछ नित्य की तरह ,
बस वही सुबह ,एक अनंत सत्य की तरह

10 } टिप्पणियाँ {comments} (+add yours?)

परमजीत सिँह बाली said...

राजेन्द्र जी,बहुत सुन्दर रचना है।बधाई स्वीकारें।

Shekhar Kumawat said...

BAHUT GAHRAI ME GAYE HE AAP

BADHAI IS KE LIYE AAP KO

Amitraghat said...

अद्भुत रचना..वाकई में ...क्या शब्द चुने हैं...."

भीमसिंह मीणा said...

Rajendr ji Bahut Achha likhte ho, Ab tak kahan the.
Aapki bhavnaon ko dekhakar Desh ke sath samaj ko bhi garv hai.
Vese aapki lekhni bahut acchi hai, lekni fir bhi Kabhi meri jarurat mahsus ho to mujhe mere mobile nambar 09424446744 pAr sampark kare.
Bs meena
sinior journlist, Dainik bhaskar bhopal, Madhy prdesh

anamika said...

बहुत अछे शब्द चुने है ....एक अछी रचना

संजय भास्कर said...

अंतिम पंक्तियाँ दिल को छू गयीं.... बहुत सुंदर कविता....

कपिल कुमार मीणा said...

dil ku chu gayi

Suman said...

nice

Suman said...

सजीव निर्जीव होकर चले है रोटी ढूँढने .v.nice

अनामिका 'अनु said...
This comment has been removed by the author.

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