लड़की बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
उसकी की माँ की बिमारी को आज पन्द्रहवा दिन था,
पिता नाम का शख्श महीनो से शराब में डूबा मग्न था,
लड़का ना पैदा करने का बदला बीस वर्षों से लेता रहा,
कन्या जन्म की घोर सजा माँ को आज तक देता रहा।
बेटी उसको ऐसा करते देख बेटा होने की कल्पना करती,
क्यूँ ना ? कुछ कमाकर, माँ-बाप की झोली सुखो से भरती,
पर जब भी कपडे सी खाल में लिपटी कुछ हड्डिया देखती,
माँ अब ना बच सकेगी , यथार्थ की धरा पर आकर सोचती।
बीमार जिस्म बेटी की बेबसी पर रात-दिन दर्द से करहाता,
शायद एक बेटा होता सबके लिए कुछ ना कुछ कर पाता,
जवान बेटी दिनभर माँ की सेवा करती, बाप की गाली खाती,
कुछ पैसे घर में होते तो अंग्रेजी दवा से माँ जरुर बच पाती।
अगले दिन हर अच्छे पडोसी से उसने पैसा मांग लिया,
कोई मदद कहीं से मिल जाए, सारा मौहल्ला छान दिया,
अब बारी सब रिश्तों की थी, जिनके होने का उसे भ्रम था,
रुपया-पैसा तो दूर दुआए मिल जाती तो भी ना कम था।
श्याम को बेटी थक कर चूर, अपनी किस्मत पे निराश हुई,
दिन की घटना को सोच अंतःकरण में ख़ुशी की आस हुई,
मस्तिष्क पटल पर किसी अपने का प्रस्ताव उभर आया,
बहुत पैसे देने के लिए थोड़ी ही देर घर पर अकेले बुलाया ।
भोली बेटी की उम्र कम पर इतनी नादान तो ना थी ,
दुनिया की भूखी नज़रो से वह अनजान तो ना थी,
जब सारे रास्ते बंद हुए तो, एक रास्ता खुला लगा,
खुद को साबित करने के लिए ये रास्ता भला लगा ।
पिता नाम का शख्श महीनो से शराब में डूबा मग्न था,
लड़का ना पैदा करने का बदला बीस वर्षों से लेता रहा,
कन्या जन्म की घोर सजा माँ को आज तक देता रहा।
बेटी उसको ऐसा करते देख बेटा होने की कल्पना करती,
क्यूँ ना ? कुछ कमाकर, माँ-बाप की झोली सुखो से भरती,
पर जब भी कपडे सी खाल में लिपटी कुछ हड्डिया देखती,
माँ अब ना बच सकेगी , यथार्थ की धरा पर आकर सोचती।
बीमार जिस्म बेटी की बेबसी पर रात-दिन दर्द से करहाता,
शायद एक बेटा होता सबके लिए कुछ ना कुछ कर पाता,
जवान बेटी दिनभर माँ की सेवा करती, बाप की गाली खाती,
कुछ पैसे घर में होते तो अंग्रेजी दवा से माँ जरुर बच पाती।
अगले दिन हर अच्छे पडोसी से उसने पैसा मांग लिया,
कोई मदद कहीं से मिल जाए, सारा मौहल्ला छान दिया,
अब बारी सब रिश्तों की थी, जिनके होने का उसे भ्रम था,
रुपया-पैसा तो दूर दुआए मिल जाती तो भी ना कम था।
श्याम को बेटी थक कर चूर, अपनी किस्मत पे निराश हुई,
दिन की घटना को सोच अंतःकरण में ख़ुशी की आस हुई,
मस्तिष्क पटल पर किसी अपने का प्रस्ताव उभर आया,
बहुत पैसे देने के लिए थोड़ी ही देर घर पर अकेले बुलाया ।
भोली बेटी की उम्र कम पर इतनी नादान तो ना थी ,
दुनिया की भूखी नज़रो से वह अनजान तो ना थी,
जब सारे रास्ते बंद हुए तो, एक रास्ता खुला लगा,
खुद को साबित करने के लिए ये रास्ता भला लगा ।
***
कुछ मजबूरी, कुछ गरीबी , कुछ माँ की सोच रुके कदमो को सहारा दिया,
बेरहम वक्त ने भी उस बेसहारा चिढाते हुए भद्दा सा कोई इशारा किया ,
गरीबी और बेबसी से लड़ने के लिए खुद को एक तेज आग में झोंक दिया,
बूढ़ा शरीर बच सके इसलिए फूल से जिस्म को एक वहशी को सौंप दिया।
अगले दिन बेटी माँ की बिमारी और बाप की सुख-सुविधा लिए बहुत कुछ कर गयी,
दुनिया की गिद्द नज़रो से खुद को बचाने के लिए एक अबला फिर खुदखुशी कर गयी,
समाज के कुछ ठेकेदार हंसकर बोले ,लड़की बिक गयी , एक इज्जत फिर लुट गयी ,
हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
******
कुछ मजबूरी, कुछ गरीबी , कुछ माँ की सोच रुके कदमो को सहारा दिया,
बेरहम वक्त ने भी उस बेसहारा चिढाते हुए भद्दा सा कोई इशारा किया ,
गरीबी और बेबसी से लड़ने के लिए खुद को एक तेज आग में झोंक दिया,
बूढ़ा शरीर बच सके इसलिए फूल से जिस्म को एक वहशी को सौंप दिया।
अगले दिन बेटी माँ की बिमारी और बाप की सुख-सुविधा लिए बहुत कुछ कर गयी,
दुनिया की गिद्द नज़रो से खुद को बचाने के लिए एक अबला फिर खुदखुशी कर गयी,
समाज के कुछ ठेकेदार हंसकर बोले ,लड़की बिक गयी , एक इज्जत फिर लुट गयी ,
हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
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विषय-
अबला,
गरीबी,
बेटी,
भूख़,
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सामाजिक बुराई
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44 } टिप्पणियाँ {comments} (+add yours?)
बहुत ही मर्म स्पर्शी रचना...रोंगटे खड़े हो गए...पर सच्चाई है
"हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।"
बहुत अन्दर तक चोट किये हो बाबु !!
Hila diya aapne...rongte khade kar diye...natmastak hun aapki is rachna par...kya chot ki hai...aur kitni marmikta se ek majboor beti ka chitran kiya...aur vehshi samaaj ko kya joota maara...ye kavita ek ratna hai...
झकझोर दिया अन्दर तक, बहुत ही सुन्दर रचना है!.
दिलीप भाई ....बस एक प्रयास किया था ....आपने इस रचना को 'रत्न' की संज्ञा दी ....शायद मेरा प्रयास सफल हुआ ....आपके साथ निलेश जी ,शिवम् जी ,संगीता जी और सभी मित्रो का शुक्रिया ...बस अपना स्नेह बनाये रखे
झकझोर दिया अन्दर तक
जीवन की विडंबनाओ को दर्शाती के उत्तम रचना...
समाज के कुछ ठेकेदार बोले ,लड़की बिक गयी , एक इज्जत फिर लुट गयी ,
हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
bahut khoob meena jee मन के अन्दर तक वार करने वाली रचना है .......पढने में कुछ कडवी है और सच भी ...पर समाज की दरिंदगी को अपने शब्दोंमें अच्छा वर्णन किया.....बस और कुछ नहीं मेरे पास कहने को इस महान कविता के लिए
ऐसे समस्याओं पर लिखना और इतना बढ़िया लिखना ....एक मुस्किल बात है ..पर आपने .....बेहतरीन लिखा .....जिसका कोई मेल नहीं
sabhi mitro ka shukriya
क्या बोलूं राजेंद्र जी ....समझ नहीं आ रहा .....एक बहुत ही असरदार कविता है ये .....दिल दहलादेने वाली रचना है .....सामाजिक बुराई के खिलाफ ....एक अच्छी कविता है
फोटो बहुत बढ़िया चुना है ....यह भी अपने आप में एक कविता है
फोटो गूगल [google] से लिया है ...इसमे मेरा कोई योगदान नहीं ..खैर आपकी तारीफ़ के लिए शुक्रिया
सादर वन्दे !
वाकई मित्र, इंसानियत तो लुट गयी. बहुत कम ऐसी यथार्थ रचनाएँ पढ़ने को मिलती है, आपकी लेखनी में दम है,
रत्नेश त्रिपाठी
andar tak utar gayi kavita...
jhak jhor dene waali rachna...
yun hi likhte rahein...
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mere blog mein is baar...
जाने क्यूँ उदास है मन....
jaroora aayein
regards
http://i555.blogspot.com/
अगले दिन बेटी माँ की बिमारी और बाप के सुख-सुविधा लिए बहुत कुछ कर गयी ,
दुनिया की गिद्द नज़रो से खुद को बचाने के लिए एक अबला फिर खुदखुशी कर गयी ,
समाज के कुछ ठेकेदार बोले ,लड़की बिक गयी , एक इज्जत फिर लुट गयी ,
हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
bhaai itna khatarnaan kaise likhta hai ..main shibu
इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी। bahut badhiyaa!!!
kya bolu is rachna kay bare mai
yeh mehaj ek rachna nahi sacchai hai......
bahut badi....dukhdai sacchai....
kash kay aisa na ho....kash
accept my regards........
हम तो निःशब्द है जी!दीलिप भाई की टिप्पणी में हिस्सा लेना चाहते है...
कुंवर जी,
...बेहद मार्मिक,प्रभावशाली व प्रसंशनीय रचना ... !!!
... बहुत बहुत बधाई !!!
dhnyavaad mitro...
Bahut sashkt rachana . dil ko dahla gayee..........
ज्ञानदत्त जी से जलने वालों! जलो मत, बराबरी करो. देखिए
जब दर्द हद से बढ़ जाता है तो पता नहीं क्यों शब्द राह भूल जाते है ..... क्या लिखूं निशब्द किया इस रचना ने
बहुत संवेदनशील ...
बहुत अच्छा लिखते हो यार राजेंद्र जी और फोटो भी बढ़िया लग रहा है नया वाला :)
Aah behad marmik rachna ...andar tak jhakjhor gai.
bahut hi aachi rachana hai...tarif ke liye kuch bhi shabd kam hai.
बेहतरीन भावाभिव्यक्ति के लिये साधुवाद स्वीकारें....
Very touching. Imotional. Thanks for such a good piece of wirting.
इंसानियत तो लुट गयी.....
dil ko dahlene vali rachna hai...
bilkul sachai likh di...
bahut mast kavita hai bhai....
ese hi likhte rho....
Ek dil ko choo jaane vaali kavita....
bahut gehrayi liye hai aapki ye panktiyaan
http://www.ankitkumargautam.blogspot.com
http://www.blondmedia.blogspot.com
kuch bhi tere andaz mai tera dard dik jata hai,
har waqt yeh kamosh samaj mere khilaaf he kyun awaz uta tha hai...
keep it up....
laga ki mai khud se mila hu good keep it up,
hope stay in touch
इस सच्चाई को बहुत सुंदर शब्दों में बयान किया है | बहुत बहुत बधाई
आशा
sach kaaha... kya kahun, shabd sab udel diye aapne hi
"हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी"
दिल को झकझोर देने वाली कविता.
आपकी कविता पढ़कर मन व ज्ञान विकसित हुआ | समाज की विक्षिप्तता यदि हमारे मन को भी विक्षिप्त कर दे तो मानवता तो गयी समझो | किन्तु इस घोर नग्नता व दरिंदगी के युग में भी हम सभी को मानवतावादी न्याय की रक्षा तो करनी ही होगी चाहे कुछ भी हो जाये |मैं संकल्प करता हूँ की मैं जीवन में किसी अबला के साथ न ये करूँगा व होने दूंगा. मैं एक पत्नीव्रत का संकल्प करता हूँ. व ऊपर के सभी टिप्पड़ीकर्ताओं से भी यही अपेक्षा करता हूँ |
जिंदगी की क्रूर सचाई की आपने बड़ी ही मार्मिक अभिव्यक्ति की हैं.
~सत्यकाम
Rajender ji , sach main ander tak hila kar rekh diya , vishvas mainey puri read karney ke baad aankho main aasun aa gey, sunder rachna nahi kahungi , kyoki yeh bahut bhayanak sachhi hai , jo sunder ho hi nahi sakti,
bas umeed kar sakti hulog is ko rad kar ke kuch soch ne par majbur hongey
rajendra ji
der se aapke blog par aayi aur is baat ka dukh hai...........behad hridaysparshi rachna likhte hain.........aankhon mein aansoo aa gaye aur bebasi ne jhakjhor diya........bahut kahna chahti hun magar kahne ke liye shabd kam pad rahe hain...........bahut hi paini drishti hai.
Waah.............;)
hyi boss...
kya likhte ho app ....
अदभुत और अतुलनीय अभिव्यक्ति .
very gud
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