जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।

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जात-पात में धुलकर आयी ढोंगी जग की जीवन-रीत,
मनु बड़ा या धर्म बड़ा, या सब से बड़ी मन प्रीत।।

लाख करो हठ बंध ना पाये धन भंगुर का राग-मल्हार,
जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।

कर्म से ओछेपन को ढक लो,गीली-मिट्टी गार सांधकर,
बौनेपन से ढक ना पाये, पौठे वाली, डग-मग भीत।

मेहनत करके पैसा खाया, वर्षो तप में तन जलाया,
कुल्ला करके भूखा रोये, सयंम से लगा धुन मीत।

कालचक्र की चकरी लुढ़के, बदले सुख-दुःख की रफ़्तार,
आँख भींचकर छींक दे भोगी, दुःख तो जाये आपही बीत।

मंदिर चढ़कर गला फकाड़े, नित-नित खाए शेर प्रसाद,
श्याम ढले घर, तंग अंगिया पे, टप-टप टपके नीत।

बेगानों के जहन में आये, सगे उधेड़े मखमली ओढ़नी,
पिता बना दुशासन चीर का, पल्ला पकडे आँचल गीत।

अश्व-असि से छांग-छांगकर भर लो सारे मुंड अजेय,
प्रेम की चुटकी, छुप के काटो, इस से बड़ी ना जीत।

घुटने,टखने,अंस मोड़कर, खूब बनी फुफकार कुंडली,
मानुष के छल-बल गुण से, शेषनाग भी है भयभीत।

गला काट के, कंठ को चूंसे, बिंगड़ा मनुजता का स्वाद,
नरक की पहली सीढ़ी मिली,या कलियुग का है शीत।

जात-पात में धुलकर आयी ढोंगी जग की जीवन-रीत,
मनु बड़ा या धर्म बड़ा, या सब से बड़ी मन प्रीत।।
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शब्दार्थ: भीत = दीवार,फकाड़े = धोना,अंगिया = चोली ।

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