दोमट पर पहली छिड़कन से !
सावन की रिमझिम बरखा ने, बिजली कोई गिराई है,
जल की बूंद पड़ी उस तन पर, आँच यहाँ तक आई है।
रवि तप से सुलगी वसुधा, आज भस्म है नवयौवन से,
दोमट पर पहली छिड़कन से, कुछ जलने की बू छाई है।
बूँदों की परतों को छुआ जो, सुर्ख लाल तप्त अधरों ने,
पानी की शीतलता झुलसी, खुद अपनी जान गवाई है।
अम्बुद ने भेजा अचला को, धर खेद-पत्र बौछारों में,
जा टूट पड़ा अल्हड यौवन पर, खूब बनी टकराई है।
काली-घटा के रस में भीगी, प्रियतमा की हरित ओढ़नी,
हरे रंग का अचरज देख, हर वन-उपवन शाक लजाई है।
पुष्प-पुष्प दर भ्रमर भटके, आकर्षण की दुर्लभ चाह में,
सारे सुमन बगिया से चुन ले, वो मोह प्रिय ने पाई है।
दसो दिशा तमस में डूबी, बरस उठा नभ से अन्धकार,
माथे से चूनर ज्यूँ ढलकी, हट धवल चन्द्रिका लाई है।
दुबका दिन बदली से बोला, हाय !भूल से, बड़ी भूल हुई,
बिन पूछे शशि ने अपने सखा से, श्वेत आभा छिटकाई है।
मोर, पपीहे, कोयल गाये, सावन-भादौं गीत मल्हार,
गौरवर्ण स्वर गायन से, क्यूँ कृष्ण-कोकिला शरमाई है।
जल की बूंद पड़ी उस तन पर, आँच यहाँ तक आई है।
रवि तप से सुलगी वसुधा, आज भस्म है नवयौवन से,
दोमट पर पहली छिड़कन से, कुछ जलने की बू छाई है।
बूँदों की परतों को छुआ जो, सुर्ख लाल तप्त अधरों ने,
पानी की शीतलता झुलसी, खुद अपनी जान गवाई है।
अम्बुद ने भेजा अचला को, धर खेद-पत्र बौछारों में,
जा टूट पड़ा अल्हड यौवन पर, खूब बनी टकराई है।
काली-घटा के रस में भीगी, प्रियतमा की हरित ओढ़नी,
हरे रंग का अचरज देख, हर वन-उपवन शाक लजाई है।
पुष्प-पुष्प दर भ्रमर भटके, आकर्षण की दुर्लभ चाह में,
सारे सुमन बगिया से चुन ले, वो मोह प्रिय ने पाई है।
दसो दिशा तमस में डूबी, बरस उठा नभ से अन्धकार,
माथे से चूनर ज्यूँ ढलकी, हट धवल चन्द्रिका लाई है।
दुबका दिन बदली से बोला, हाय !भूल से, बड़ी भूल हुई,
बिन पूछे शशि ने अपने सखा से, श्वेत आभा छिटकाई है।
मोर, पपीहे, कोयल गाये, सावन-भादौं गीत मल्हार,
गौरवर्ण स्वर गायन से, क्यूँ कृष्ण-कोकिला शरमाई है।
गौरी ने जब सुर-संगम छेड़ा, वसु दंग अवतार देखते,
स्वर्ग त्याग माँ शारदा ने, क्यूँ वीणा भग्न बजाई है।
पग उठने लगे मद में आ, प्रकृति की ताल-ताल पर,
विश्व कलापी नर्तन बाला ने, उदक में धूम मचाई है।
झनक-झनक बिन पायल-घुंघरू, झनक उठी झंकार,
कदम-कदम का पड़ना देखो, नट नृत्य छवि सजाई है।
रज़त सरीकी चटक देह, कनक केश काँधे पर ठहरे,
अंग-अंग से आसव बरसे, झूल चटक कली चटकाई है।
पलको में मदिरा के प्याले, पांव चले के धुत्त शराबी,
सोचे अचंभा नशे-नशे में, मय, अभी-अभी ढुलाई है।
थक हार लौट कर हुई वापसी, दर्पण से आँखें चार करे,
काजल से एक बिंदिया ले, कह नज़र लगी उतराई है।
झट खुले नाग जूडे में कस लो, डस काले-काले काल हुए,
पिछली शरारत से मुकुर के माथे, फटी अभी बिवाई है।
दाग नहीं तो चाँद सी काया, वज्र मोहिनी सा गर्व करे,
कोमल तन में निर्मल मन, दर्प दोष की पूर्ण भरपाई है।
हृदय पर एकमात्र आभूषण, जिसे लज्जा और शर्म कहे,
कुशल-सुघड़ इस स्वर्ण-सौन्दर्य में ,सागर सी गहराई है।
अंग-अंग की देख व्यवस्था, मन सयंम डामा-डोल हुआ,
उस पर फिसलन से भीगे आँचल ने और क़यामत ढाई है।
सावन की रिमझिम बरखा ने, बिजली कोई गिराई है,
जल की बूंद पड़ी उस तन पर, आँच यहाँ तक आई है।
*****
कुछ शब्दार्थ : स्वधा ,अम्बु =जल, आसव =मदिरा, मुकुर = दर्पण
* अगर किसी शब्द अथवा पंक्ति का अर्थ समझने में कोई समस्या है तो निसंकोच कहे, आपकी शंका समाधान में मुझे प्रसन्नता होगी :) कुछ कमी ही तो भी सूचित करे
विषय-
गीत,
प्रेम,
मेरी कविताएँ
जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।
जात-पात में धुलकर आयी ढोंगी जग की जीवन-रीत,
मनु बड़ा या धर्म बड़ा, या सब से बड़ी मन प्रीत।।
लाख करो हठ बंध ना पाये धन भंगुर का राग-मल्हार,
जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।
कर्म से ओछेपन को ढक लो,गीली-मिट्टी गार सांधकर,
बौनेपन से ढक ना पाये, पौठे वाली, डग-मग भीत।
मेहनत करके पैसा खाया, वर्षो तप में तन जलाया,
कुल्ला करके भूखा रोये, सयंम से लगा धुन मीत।
कालचक्र की चकरी लुढ़के, बदले सुख-दुःख की रफ़्तार,
आँख भींचकर छींक दे भोगी, दुःख तो जाये आपही बीत।
मंदिर चढ़कर गला फकाड़े, नित-नित खाए शेर प्रसाद,
श्याम ढले घर, तंग अंगिया पे, टप-टप टपके नीत।
बेगानों के जहन में आये, सगे उधेड़े मखमली ओढ़नी,
पिता बना दुशासन चीर का, पल्ला पकडे आँचल गीत।
अश्व-असि से छांग-छांगकर भर लो सारे मुंड अजेय,
प्रेम की चुटकी, छुप के काटो, इस से बड़ी ना जीत।
घुटने,टखने,अंस मोड़कर, खूब बनी फुफकार कुंडली,
मानुष के छल-बल गुण से, शेषनाग भी है भयभीत।
गला काट के, कंठ को चूंसे, बिंगड़ा मनुजता का स्वाद,
नरक की पहली सीढ़ी मिली,या कलियुग का है शीत।
जात-पात में धुलकर आयी ढोंगी जग की जीवन-रीत,
मनु बड़ा या धर्म बड़ा, या सब से बड़ी मन प्रीत।।
*****
मनु बड़ा या धर्म बड़ा, या सब से बड़ी मन प्रीत।।
लाख करो हठ बंध ना पाये धन भंगुर का राग-मल्हार,
जितना गाओ घिंसता जाये जीवन का धुंधला संगीत।
कर्म से ओछेपन को ढक लो,गीली-मिट्टी गार सांधकर,
बौनेपन से ढक ना पाये, पौठे वाली, डग-मग भीत।
मेहनत करके पैसा खाया, वर्षो तप में तन जलाया,
कुल्ला करके भूखा रोये, सयंम से लगा धुन मीत।
कालचक्र की चकरी लुढ़के, बदले सुख-दुःख की रफ़्तार,
आँख भींचकर छींक दे भोगी, दुःख तो जाये आपही बीत।
मंदिर चढ़कर गला फकाड़े, नित-नित खाए शेर प्रसाद,
श्याम ढले घर, तंग अंगिया पे, टप-टप टपके नीत।
बेगानों के जहन में आये, सगे उधेड़े मखमली ओढ़नी,
पिता बना दुशासन चीर का, पल्ला पकडे आँचल गीत।
अश्व-असि से छांग-छांगकर भर लो सारे मुंड अजेय,
प्रेम की चुटकी, छुप के काटो, इस से बड़ी ना जीत।
घुटने,टखने,अंस मोड़कर, खूब बनी फुफकार कुंडली,
मानुष के छल-बल गुण से, शेषनाग भी है भयभीत।
गला काट के, कंठ को चूंसे, बिंगड़ा मनुजता का स्वाद,
नरक की पहली सीढ़ी मिली,या कलियुग का है शीत।
जात-पात में धुलकर आयी ढोंगी जग की जीवन-रीत,
मनु बड़ा या धर्म बड़ा, या सब से बड़ी मन प्रीत।।
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शब्दार्थ: भीत = दीवार,फकाड़े = धोना,अंगिया = चोली ।
विषय-
अबला,
गीत,
जीवन-दर्शन,
दोहावली,
प्रेम,
बेटी,
मेरी कविताएँ,
सामाजिक बुराई
मुझे गर्व है की मैं भिखारी हूँ.
मैं मंदिर की सीढ़ी पर बैठा भिखारी,
जिसे दुत्कारती ये दुनिया सारी,
हर बन्दे में ईश्वर को मानता हूँ,
आज खुदा से ये जवाब मांगता हूँ।
सुना है तेरा घर है बड़ा सा तू यही रहता है,
ये मैं भिखारी नहीं सारा जमाना कहता है,
इस घर के करीब एक पडोसी भी रहता है,
भगवान के नाम पे कुछ दे ,तुझ से कहता है
चोरी-डकैती, लूटमार मैं करता नहीं,
चाक़ू-छुरे से लोगो पर वार करता नहीं,
छीनकर रोटी तो मैं पेट भरता नहीं,
किसी अबला की इज्ज़त हरता नहीं ।
कोई दे कुछ ख़ुशी से तो लेता हूँ,
सच्चे मन से उन्हें दुआएं देता हूँ,
जो भी मिल जाए खुश ही होता हूँ,
जिंदगी का बोझ हंसकर ढोता हूँ ।
फिर भी ये दुनिया मुझे दुत्कारती है,
पास भी जाऊं तो डर के दूर भागती है,
पैर भी छू लू माथे से, लात ही मारती है,
दो पैसे देकर भरपेट फटकारती है ।
अब मेरी तसल्ली इन सब से हारी है,
दोगला व्यवहार देख मन बड़ा भारी है,
सच कहूं तो ये सारा जहाँ भिखारी है,
एक दाता और भिक्षु दुनिया सारी है ।
मैं तो फिर भी आत्मप्रेम से मांगता हूँ,
हर चेहरे के सच का सच मैं जानता हूँ,
कुछ तो बहुत मंगाकर भी छीनते है,
जली लाशो से तक सिक्के बीनते है ।
आम आदमी मांगे तो कारण गरीबी और मजबूरी है,
परन्तु नेता और अफसरों का मांगना क्या जरूरी है,
भीख लेकर भी ये पापी जनता का खून चूसते है,
ना मिले तो अपने हाथो से उनका घर फूंकते है ।
कोई पैसे को, कोई प्रेम को,कोई खुद को छानता है,
हर जीव किसी से कुछ-ना-कूछ जीवन भर मांगता है,
गौर से देखोगे तो संसार की सच्चाई जान जाओगे,
स्यंव के अन्दर एक गरीब लाचार भिखारी पाओगे।
मैं मंदिर की सीढ़ी पर बैठा भिखारी,
जिसे दुत्कारती ये दुनिया सारी,
हर बन्दे में ईश्वर को मानता हूँ,
आज खुदा से ये जवाब मांगता हूँ।
{ये अच्छा है तो ये भी पढ़े}
जिसे दुत्कारती ये दुनिया सारी,
हर बन्दे में ईश्वर को मानता हूँ,
आज खुदा से ये जवाब मांगता हूँ।
सुना है तेरा घर है बड़ा सा तू यही रहता है,
ये मैं भिखारी नहीं सारा जमाना कहता है,
इस घर के करीब एक पडोसी भी रहता है,
भगवान के नाम पे कुछ दे ,तुझ से कहता है
चोरी-डकैती, लूटमार मैं करता नहीं,
चाक़ू-छुरे से लोगो पर वार करता नहीं,
छीनकर रोटी तो मैं पेट भरता नहीं,
किसी अबला की इज्ज़त हरता नहीं ।
कोई दे कुछ ख़ुशी से तो लेता हूँ,
सच्चे मन से उन्हें दुआएं देता हूँ,
जो भी मिल जाए खुश ही होता हूँ,
जिंदगी का बोझ हंसकर ढोता हूँ ।
फिर भी ये दुनिया मुझे दुत्कारती है,
पास भी जाऊं तो डर के दूर भागती है,
पैर भी छू लू माथे से, लात ही मारती है,
दो पैसे देकर भरपेट फटकारती है ।
अब मेरी तसल्ली इन सब से हारी है,
दोगला व्यवहार देख मन बड़ा भारी है,
सच कहूं तो ये सारा जहाँ भिखारी है,
एक दाता और भिक्षु दुनिया सारी है ।
मैं तो फिर भी आत्मप्रेम से मांगता हूँ,
हर चेहरे के सच का सच मैं जानता हूँ,
कुछ तो बहुत मंगाकर भी छीनते है,
जली लाशो से तक सिक्के बीनते है ।
आम आदमी मांगे तो कारण गरीबी और मजबूरी है,
परन्तु नेता और अफसरों का मांगना क्या जरूरी है,
भीख लेकर भी ये पापी जनता का खून चूसते है,
ना मिले तो अपने हाथो से उनका घर फूंकते है ।
कोई पैसे को, कोई प्रेम को,कोई खुद को छानता है,
हर जीव किसी से कुछ-ना-कूछ जीवन भर मांगता है,
गौर से देखोगे तो संसार की सच्चाई जान जाओगे,
स्यंव के अन्दर एक गरीब लाचार भिखारी पाओगे।
मैं मंदिर की सीढ़ी पर बैठा भिखारी,
जिसे दुत्कारती ये दुनिया सारी,
हर बन्दे में ईश्वर को मानता हूँ,
आज खुदा से ये जवाब मांगता हूँ।
{ये अच्छा है तो ये भी पढ़े}
विषय-
गरीबी,
जीवन-दर्शन,
भूख़,
मेरी कविताएँ,
सामाजिक बुराई
लड़की बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
उसकी की माँ की बिमारी को आज पन्द्रहवा दिन था,
पिता नाम का शख्श महीनो से शराब में डूबा मग्न था,
लड़का ना पैदा करने का बदला बीस वर्षों से लेता रहा,
कन्या जन्म की घोर सजा माँ को आज तक देता रहा।
बेटी उसको ऐसा करते देख बेटा होने की कल्पना करती,
क्यूँ ना ? कुछ कमाकर, माँ-बाप की झोली सुखो से भरती,
पर जब भी कपडे सी खाल में लिपटी कुछ हड्डिया देखती,
माँ अब ना बच सकेगी , यथार्थ की धरा पर आकर सोचती।
बीमार जिस्म बेटी की बेबसी पर रात-दिन दर्द से करहाता,
शायद एक बेटा होता सबके लिए कुछ ना कुछ कर पाता,
जवान बेटी दिनभर माँ की सेवा करती, बाप की गाली खाती,
कुछ पैसे घर में होते तो अंग्रेजी दवा से माँ जरुर बच पाती।
अगले दिन हर अच्छे पडोसी से उसने पैसा मांग लिया,
कोई मदद कहीं से मिल जाए, सारा मौहल्ला छान दिया,
अब बारी सब रिश्तों की थी, जिनके होने का उसे भ्रम था,
रुपया-पैसा तो दूर दुआए मिल जाती तो भी ना कम था।
श्याम को बेटी थक कर चूर, अपनी किस्मत पे निराश हुई,
दिन की घटना को सोच अंतःकरण में ख़ुशी की आस हुई,
मस्तिष्क पटल पर किसी अपने का प्रस्ताव उभर आया,
बहुत पैसे देने के लिए थोड़ी ही देर घर पर अकेले बुलाया ।
भोली बेटी की उम्र कम पर इतनी नादान तो ना थी ,
दुनिया की भूखी नज़रो से वह अनजान तो ना थी,
जब सारे रास्ते बंद हुए तो, एक रास्ता खुला लगा,
खुद को साबित करने के लिए ये रास्ता भला लगा ।
पिता नाम का शख्श महीनो से शराब में डूबा मग्न था,
लड़का ना पैदा करने का बदला बीस वर्षों से लेता रहा,
कन्या जन्म की घोर सजा माँ को आज तक देता रहा।
बेटी उसको ऐसा करते देख बेटा होने की कल्पना करती,
क्यूँ ना ? कुछ कमाकर, माँ-बाप की झोली सुखो से भरती,
पर जब भी कपडे सी खाल में लिपटी कुछ हड्डिया देखती,
माँ अब ना बच सकेगी , यथार्थ की धरा पर आकर सोचती।
बीमार जिस्म बेटी की बेबसी पर रात-दिन दर्द से करहाता,
शायद एक बेटा होता सबके लिए कुछ ना कुछ कर पाता,
जवान बेटी दिनभर माँ की सेवा करती, बाप की गाली खाती,
कुछ पैसे घर में होते तो अंग्रेजी दवा से माँ जरुर बच पाती।
अगले दिन हर अच्छे पडोसी से उसने पैसा मांग लिया,
कोई मदद कहीं से मिल जाए, सारा मौहल्ला छान दिया,
अब बारी सब रिश्तों की थी, जिनके होने का उसे भ्रम था,
रुपया-पैसा तो दूर दुआए मिल जाती तो भी ना कम था।
श्याम को बेटी थक कर चूर, अपनी किस्मत पे निराश हुई,
दिन की घटना को सोच अंतःकरण में ख़ुशी की आस हुई,
मस्तिष्क पटल पर किसी अपने का प्रस्ताव उभर आया,
बहुत पैसे देने के लिए थोड़ी ही देर घर पर अकेले बुलाया ।
भोली बेटी की उम्र कम पर इतनी नादान तो ना थी ,
दुनिया की भूखी नज़रो से वह अनजान तो ना थी,
जब सारे रास्ते बंद हुए तो, एक रास्ता खुला लगा,
खुद को साबित करने के लिए ये रास्ता भला लगा ।
***
कुछ मजबूरी, कुछ गरीबी , कुछ माँ की सोच रुके कदमो को सहारा दिया,
बेरहम वक्त ने भी उस बेसहारा चिढाते हुए भद्दा सा कोई इशारा किया ,
गरीबी और बेबसी से लड़ने के लिए खुद को एक तेज आग में झोंक दिया,
बूढ़ा शरीर बच सके इसलिए फूल से जिस्म को एक वहशी को सौंप दिया।
अगले दिन बेटी माँ की बिमारी और बाप की सुख-सुविधा लिए बहुत कुछ कर गयी,
दुनिया की गिद्द नज़रो से खुद को बचाने के लिए एक अबला फिर खुदखुशी कर गयी,
समाज के कुछ ठेकेदार हंसकर बोले ,लड़की बिक गयी , एक इज्जत फिर लुट गयी ,
हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
******
कुछ मजबूरी, कुछ गरीबी , कुछ माँ की सोच रुके कदमो को सहारा दिया,
बेरहम वक्त ने भी उस बेसहारा चिढाते हुए भद्दा सा कोई इशारा किया ,
गरीबी और बेबसी से लड़ने के लिए खुद को एक तेज आग में झोंक दिया,
बूढ़ा शरीर बच सके इसलिए फूल से जिस्म को एक वहशी को सौंप दिया।
अगले दिन बेटी माँ की बिमारी और बाप की सुख-सुविधा लिए बहुत कुछ कर गयी,
दुनिया की गिद्द नज़रो से खुद को बचाने के लिए एक अबला फिर खुदखुशी कर गयी,
समाज के कुछ ठेकेदार हंसकर बोले ,लड़की बिक गयी , एक इज्जत फिर लुट गयी ,
हम बोले ! सच्चाई बिक गयी, इज्ज़त का पता नहीं , हाँ, इंसानियत तो लुट गयी।
******
विषय-
अबला,
गरीबी,
बेटी,
भूख़,
मेरी कविताएँ,
सामाजिक बुराई
काश ! हम इतने बड़े ना होते , हमें ये अहंकार विरासत में ना मिले होते
सांझ ढले , वक़्त से वक़्त मिले , दो अबोध बालक घर से चले ,
कुछ दूर जाकर दोनों मिले , सुन्दर सी जगह ढूंढ़ ,खेलने लगे ।
बहुत ही मनमोहक उनका खेल हो रहा था ,
खेल के बहाने मित्रता का मेल हो रहा था ।
खेलते - खलेते कुछ ही वक़्त गुज़रा , तभी एक बालक बिंगड़ा ,
गुत्थम-गुत्था होकर दुसरे को पकड़ा , हो गया शायद कुछ झगड़ा ।
जितने मन से खेल रहे थे , उतने से ही लड़ने लगे ,
बड़े उतावले हो किसी जानवर की तरह भिड़ने लगे ।
एक ज्यादा अड़ा था , उम्र में कुछ बड़ा था , बाहुबल दिखाया ,
बड़ी ताक़त के साथ जमकर एक तमाचा छोटे को लगाया ।
कोमल शरीर पर चोट से , थोड़ा सा दर्द होने लगा ,
पर पीड़ा के बढ़ने से , अब नन्हा बालक रोने लगा ।
अपने मित्र को रोते देख दूसरा भी दुखी होने लगा ,
उसका क्रोध और बैर पश्च्याताप में खोने लगा ।
धीरे से पास जाकर अपने हाथो से उसके आंसू पोछ दिए ,
सारे गिले शिकवे इन आंसुओं के साथ मिटाकर दूर किये ।
फिर नित्य की तरह कंधे पर हाथ रख, चलते हुए दूर रास्ते में खो गए ,
दिन का सारा घटना चक्र भूलकर रात को परियो की याद में सो गए ।
रोज का उनका यही क्रम था , फिर भी किसी बात का कोई ग़म नहीं था,
पहले झगड़ना फिर मिलना , उनके लिए किसी खिलौने से कम नहीं था ।
*
काश ! हम इतने बड़े ना होते , हमें ये अहंकार विरासत में ना मिले होते ,
कुछ करते ,कुछ लड़ते ,कुछ रोते , फिर मिलते, रात को सब भूल चैन से सोते।
**********
कुछ दूर जाकर दोनों मिले , सुन्दर सी जगह ढूंढ़ ,खेलने लगे ।
बहुत ही मनमोहक उनका खेल हो रहा था ,
खेल के बहाने मित्रता का मेल हो रहा था ।
खेलते - खलेते कुछ ही वक़्त गुज़रा , तभी एक बालक बिंगड़ा ,
गुत्थम-गुत्था होकर दुसरे को पकड़ा , हो गया शायद कुछ झगड़ा ।
जितने मन से खेल रहे थे , उतने से ही लड़ने लगे ,
बड़े उतावले हो किसी जानवर की तरह भिड़ने लगे ।
एक ज्यादा अड़ा था , उम्र में कुछ बड़ा था , बाहुबल दिखाया ,
बड़ी ताक़त के साथ जमकर एक तमाचा छोटे को लगाया ।
कोमल शरीर पर चोट से , थोड़ा सा दर्द होने लगा ,
पर पीड़ा के बढ़ने से , अब नन्हा बालक रोने लगा ।
अपने मित्र को रोते देख दूसरा भी दुखी होने लगा ,
उसका क्रोध और बैर पश्च्याताप में खोने लगा ।
धीरे से पास जाकर अपने हाथो से उसके आंसू पोछ दिए ,
सारे गिले शिकवे इन आंसुओं के साथ मिटाकर दूर किये ।
फिर नित्य की तरह कंधे पर हाथ रख, चलते हुए दूर रास्ते में खो गए ,
दिन का सारा घटना चक्र भूलकर रात को परियो की याद में सो गए ।
रोज का उनका यही क्रम था , फिर भी किसी बात का कोई ग़म नहीं था,
पहले झगड़ना फिर मिलना , उनके लिए किसी खिलौने से कम नहीं था ।
*
काश ! हम इतने बड़े ना होते , हमें ये अहंकार विरासत में ना मिले होते ,
कुछ करते ,कुछ लड़ते ,कुछ रोते , फिर मिलते, रात को सब भूल चैन से सोते।
**********
विषय-
जीवन-दर्शन,
बचपन,
मेरी कविताएँ
एक अनंत सत्य की तरह
आज भी है नवनिर्मित कुछ नित्य की तरह ,
बस वही सुबह , एक अनंत सत्य की तरह ।
उकास का कारवां चला आ रहा है ,
स्वप्न खग के परों को कुतरते हुए ।
आसमां का रंग स्याह हो गया है ,
भोर ने जकड़ ली है ,बाहें धुंध की ।
समय की लय अनवरत कर रही है ,
हवा से मिलकर गुबार की साजिश ।
टूटता जा रहा है यूँ विरल अन्धकार ,
किस्तों में विशाल हिमखंड के जैसे ।
ब्रह्मांड का प्रकाशपुंज झाँक रहा है ,
किसी पहाड़ के गर्वित अड़े अंस से ।
सूर्य ही ले रहा है अंगडाई इठलाकर ,
रात के खुमार की कैद से छूटने को ।
सूर्य ही ले रहा है अंगडाई इठलाकर ,
रात के खुमार की कैद से छूटने को ।
चन्द्र पलायन को है तैयार झोला उठा ,
पूरी हो गयी है आज की चाकरी अब।
पूर्व की ओर कोई हलचल तो हुई है ,
झटक रही है उषा कुछ, अलसाई सी ।
चौंक कर उठ गए है ओस के मोती ,
समेटते है भयभीत अपना अस्तित्व।
बढता जा रहा है पक्षियों का कलरव ,
निमंत्रण दे रहा है ,जीवन की गति को।
सजीव निर्जीव होकर चले है रोटी ढूँढने ,
कुछ अभी भी पड़े है निर्लज्ज तन कर ।
आज भी है नवनिर्मित कुछ नित्य की तरह ,
बस वही सुबह ,एक अनंत सत्य की तरह ।
विषय-
जीवन-दर्शन,
मेरी कविताएँ
झड़ की टोकरी !
मन को झिंझोड़कर हम कवि हो गए ,
ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए ।
तोड़ कर रख दिया शब्द के दंभ को ,
जोड़ कर रख दिया उस स्वप्न छिन्न को ,
मोड़ कर रख दिया भय की तरंग को ,
मारकर एक कलंक ,हम शिकारी हो गए ।
काट कर रख दिया टूट चुके तान को ,
छाँट कर रख दिया नम रेत से धान को,
गाँठ कर रख दिया खुले हुए मचान को ,
छोड़कर सभी गाँव , हम बटोही हो गए ।
कह कर रख दिया उधार जिन्दगी को ,
सह कर रख दिया दुःख की बंदगी को ,
रह कर रख दिया अहम् की गंदगी को ,
धुल तप के जल में, हम स्वच्छ हो गए ।
मर कर रख दिया हाथ से कफ़न को ,
हर कर रख दिया उस घटित गबन को ,
भर कर रख दिया कलियों से चमन को ,
चुराके झड़ की टोकरी ,हम बागवां हो गए।
तय कर रख दिया भविष्य के कर्म को,
व्यय कर रख दिया व्यर्थ के धर्म को ,
क्षय कर रख दिया हृदय के मर्म को,
छोड़कर सभी भाव ,हम पाषाण हो गए।
हेर कर रख दिया खोये हुए मनन को ,
ढेर करके रख दिया भूत के हनन को
फेर कर रख दिया काल के दर्पण को ,
फेंककर मृत्यु का डर,हम अमर हो गए ।
बोल कर रख दिया मौन अधिकार को ,
तोल कर रख दिया बोझिल झंकार को,
खोल कर रख दिया उलझे विचार को ,
भूलकर सभी शत्रु , हम अजेय हो गए ।
मन को झिंझोड़कर हम कवि हो गए ,
ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए।
ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए ।
तोड़ कर रख दिया शब्द के दंभ को ,
जोड़ कर रख दिया उस स्वप्न छिन्न को ,
मोड़ कर रख दिया भय की तरंग को ,
मारकर एक कलंक ,हम शिकारी हो गए ।
काट कर रख दिया टूट चुके तान को ,
छाँट कर रख दिया नम रेत से धान को,
गाँठ कर रख दिया खुले हुए मचान को ,
छोड़कर सभी गाँव , हम बटोही हो गए ।
कह कर रख दिया उधार जिन्दगी को ,
सह कर रख दिया दुःख की बंदगी को ,
रह कर रख दिया अहम् की गंदगी को ,
धुल तप के जल में, हम स्वच्छ हो गए ।
मर कर रख दिया हाथ से कफ़न को ,
हर कर रख दिया उस घटित गबन को ,
भर कर रख दिया कलियों से चमन को ,
चुराके झड़ की टोकरी ,हम बागवां हो गए।
तय कर रख दिया भविष्य के कर्म को,
व्यय कर रख दिया व्यर्थ के धर्म को ,
क्षय कर रख दिया हृदय के मर्म को,
छोड़कर सभी भाव ,हम पाषाण हो गए।
हेर कर रख दिया खोये हुए मनन को ,
ढेर करके रख दिया भूत के हनन को
फेर कर रख दिया काल के दर्पण को ,
फेंककर मृत्यु का डर,हम अमर हो गए ।
बोल कर रख दिया मौन अधिकार को ,
तोल कर रख दिया बोझिल झंकार को,
खोल कर रख दिया उलझे विचार को ,
भूलकर सभी शत्रु , हम अजेय हो गए ।
मन को झिंझोड़कर हम कवि हो गए ,
ढूंढ़कर प्रकाशकण हम भी रवि हो गए।
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एक अनंत सत्य की तरह ये तीन शब्द भाभी के भोले चहरे
विषय-
जीवन-दर्शन,
मेरी कविताएँ
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